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	<title>सुधाकर पाठक </title>
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	<description>अध्यक्ष, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी </description>
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		<title>भारतीय भाषा दिवस भाषाई सौहार्द के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण का उत्सव है</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Jun 2024 09:49:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मनोविज्ञान का सिद्धान्त यह कहता है कि यदि आपको किसी के हृदय में अपनी जगह बनानी हो अथवा किसी व्यक्ति को गहराई से जानना-समझना हो, तो उसकी मातृभाषा में बात करिए । प्रत्येक मनुष्य अपनी मातृभाषा से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है । यह भावनात्मक जुड़ाव मनुष्य के मस्तिष्क में इतनी गहरी पैठ बना चुकी होती है, कि मनुष्य अपनी भाषा से पृथक रहकर किसी अन्य भाषा में नवीन कल्पना कर ही नहीं सकता । यदि कोई मनुष्य अपनी भाषा को छोड़कर किसी अन्य भाषा में संवाद स्थापित कर रहा है, तो उसमें उसकी मौलिकता नहीं है, अपितु वो उसके मस्तिष्क द्वारा किया गया अनुवाद मात्र है । यह अनुवाद इतनी तीव्र गति से होता है कि बोलने वाले को भी स्वयं महसूस नहीं होता । विज्ञान भी यह मानता है कि मनुष्य के मस्तिष्क में जिस भाषा में चीज़ें, वस्तुएँ, विचार, चिंतन, रंग, चित्र, ध्वनि, स्वाद, सुगन्ध, प्रेम, करुणा, ईर्ष्या, स्वप्न आदि कोडिंग होती है वो उसकी मातृभाषा में होती है । आप विश्व के अनेक भाषा में बोलिए, किन्तु जो सहजता आपको अपनी भाषा में मिलती है वो अन्य भाषा में नहीं मिल सकती । किसी भी व्यक्ति की मौलिकता केवल उसकी मातृभाषा में ही झलकती है । यही कारण है कि मनुष्य अपनी भाषा के प्रति अति संवेदनशील होता है । जहाँ कहीं भी उसकी भाषाई अस्मिता की बात आती है तो वो उद्धेलित होता है । यह भाषाई अस्मिता ही क्षेत्रवाद का रूप लेती है । क्षेत्रवाद की भावना शक्ति का एक रूप है, किन्तु जब हावी होती है तो यह राष्ट्रवाद की भावना को बहुत तेजी से खोखला करना शुरू कर देती है । यहीं से एक ही राष्ट्र में रहने वाले नागरिकों के बीच वैमनस्य अपनी जगह बना लेती है जो आपसी सौहार्द और भाईचारा को दो भिन्न भाषा, संस्कृति, साहित्य और कला के बीच रमने वाले लोगों के बीच पनपने नहीं देती । क्षेत्रवाद की अवधारणा सदैव नकारात्मक ही होती है, ऐसा कतई नहीं है । हरेक क्षेत्र की अपनी एक पहचान होती है । हरेक क्षेत्र की अपनी भिन्न भाषा, संस्कृति, साहित्य, परम्परा, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान, कला, संगीत, आस्था और धार्मिक मान्यता होती है । यह सभी आर्थिक पक्ष, सामाजिक संरचना, धार्मिक मूल्य-मान्यताएँ और सांस्कृतिक सम्पदा ही किसी राज्य की विरासत होती है । राज्य में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने क्षेत्र की कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान के लिए कर्तव्यनिष्ठ है । किन्तु हमारा उद्देश्य क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास और एकता को स्थापित करना होना चाहिए । यही एक नागरिक की राष्टवाद की भावना है । भारत एक संविधान सम्मत राष्ट्र है । भारतीय संविधान भारत के किसी भी भू-भाग में रहने वाले नागरिक की जाति, धर्म, पन्थ, भाषा, कला और संस्कृति का सम्मान करती है । संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य और न्याय व्यवस्था निर्दिष्ट है । भारतीय संविधान 22 भागों में वर्गीकृत है जिसमें 395 मुख्य अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं । संविधान का अनुच्छेद 343 से 351 राजभाषा हिन्दी से सम्बन्धित है तथा आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय आधिकारिक भाषाओं का उल्लेख है । संविधान में निर्दिष्ट भाषाओं के अतिरिक्त भी भारत में कई भाषाएँ, उपभाषाएँ एवं बोलियाँ बोली जाती हैं । यह भाषाई विविधता ही भारत की अप्रतिम सुन्दरता है । कोई भी भाषा कदाचित अकेली नहीं होती, अपितु उसके साथ-साथ उस भाषा में विद्यमान संस्कृति और साहित्य भी प्रवाहित होती है । किसी भी भाषा का अस्तित्व उसके बोलने वाले लोगों के आचरण पर टिका होता है । जब तक समाज में भाषा प्रयुक्त होती रहेगी और उसका अगली पीढ़ी में हस्तांतरण होता रहेगा तब तक भाषा जिन्दा रहेगी । यदि भाषा का हस्तांतरण रुक जाता है या कम हो जाता है, तो उस भाषा के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है । मनुष्य के जीवन में भाषा की बहुत बड़ी भूमिका होती है । भाषा ने मनुष्य के जीवन को बहुत सरल और व्यवस्थित बनाया है । यदि भाषा ही न होती तो मनुष्य आज प्रगति के इतने उत्कर्ष शिखर तक पहुँच ही नहीं पाता । यह भाषा की ही देन है कि उसने मनुष्य के जीवन को इतना सरल बना दिया है, नहीं तो मनुष्य आज इतनी उचाइयों पर कहाँ होता ? इतने आविष्कार, खोज-अनुसंधान, सूचना प्रवाह, संचार संसाधन, उद्योग, व्यवसाय, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय आदि का निर्माण कैसे होता ? कैसे रखा जाता वस्तु विनिमय और क्रय-विक्रय का हिसाब ? कैसे रखा जाता इतिहास के दस्तावेजों को सुरक्षित ? विविध संस्कृति और सभ्यता का प्रचार-प्रसार कैसे होता ? विभिन्न कालखंड के विशाल साहित्य के अस्तित्व का क्या होता ? हमारे विचारों को सक्रिय बनाने में भाषा का बहुत बड़ा योगदान है । भाषा के लिखित और मौखिक रूप के कारण हम अपनी संवेदना, सहानुभूति, आकांक्षा, चिंतन, प्रेम और भाव को दूसरों के हृदय तक संप्रेषित कर पाते हैं । भाषा का अस्तित्व सिर्फ भाव सम्प्रेषण तक ही सीमित नहीं है, अपितु आज के भूमंडलीकरण, वैज्ञानिक और सूचना क्रांति के समय में राष्ट्रीय अस्मिता से भी है । हमारे पास भाषा का बहुत संकुचित दायरा है । असल में हमने भाषा के महत्त्व को समझा ही नहीं है । किसी भी भाषा के विलुप्त होने से उसके स्थान पर उसकी ही कोई परिष्कृत नई भाषा का जन्म नहीं होता ,बल्कि उसे विस्थापित करने वाली वर्चस्ववादी भाषा अपना दबदबा बना लेती है । विश्व में कई भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं, कई विलुप्त होने की स्थिति में है । भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण के अनुसार विश्व की 6000 भाषाओं में से 4000 भाषाएँ विलुप्त होने की स्थिति में हैं जिनमें 10 प्रतिशत भाषाएँ भारत की हैं । यूनेस्को द्वारा तैयार एक सूची के अनुसार भारत की 42 भाषाएँ एवं बोलियाँ इस समय विलुप्त होने की स्थिति में हैं । केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार 10000 से भी कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को लुप्तप्राय माना गया है । इस श्रेणी में पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, झारखण्ड, कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महारष्ट्र आदि राज्यों की क्षेत्रीय भाषाएँ सम्मिलित हैं । यूनेस्को के अनुसार अंडमान में जारवा भाषा बोलने वालों की संख्या 31 है तो ग्रेट अंडमानीज बोलने वालों की]]></description>
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<p>मनोविज्ञान का सिद्धान्त यह कहता है कि यदि आपको किसी के हृदय में अपनी जगह बनानी हो अथवा किसी व्यक्ति को गहराई से जानना-समझना हो, तो उसकी मातृभाषा में बात करिए । प्रत्येक मनुष्य अपनी मातृभाषा से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है । </p>



<p>यह भावनात्मक जुड़ाव मनुष्य के मस्तिष्क में इतनी गहरी पैठ बना चुकी होती है, कि मनुष्य अपनी भाषा से पृथक रहकर किसी अन्य भाषा में नवीन कल्पना कर ही नहीं सकता । यदि कोई मनुष्य अपनी भाषा को छोड़कर किसी अन्य भाषा में संवाद स्थापित कर रहा है, तो उसमें उसकी मौलिकता नहीं है, अपितु वो उसके मस्तिष्क द्वारा किया गया अनुवाद मात्र है । </p>



<p>यह अनुवाद इतनी तीव्र गति से होता है कि बोलने वाले को भी स्वयं महसूस नहीं होता । विज्ञान भी यह मानता है कि मनुष्य के मस्तिष्क में जिस भाषा में चीज़ें, वस्तुएँ, विचार, चिंतन, रंग, चित्र, ध्वनि, स्वाद, सुगन्ध, प्रेम, करुणा, ईर्ष्या, स्वप्न आदि कोडिंग होती है वो उसकी मातृभाषा में होती है । </p>



<p>आप विश्व के अनेक भाषा में बोलिए, किन्तु जो सहजता आपको अपनी भाषा में मिलती है वो अन्य भाषा में नहीं मिल सकती । किसी भी व्यक्ति की मौलिकता केवल उसकी मातृभाषा में ही झलकती है । यही कारण है कि मनुष्य अपनी भाषा के प्रति अति संवेदनशील होता है । </p>



<p>जहाँ कहीं भी उसकी भाषाई अस्मिता की बात आती है तो वो उद्धेलित होता है । यह भाषाई अस्मिता ही क्षेत्रवाद का रूप लेती है । क्षेत्रवाद की भावना शक्ति का एक रूप है, किन्तु जब हावी होती है तो यह राष्ट्रवाद की भावना को बहुत तेजी से खोखला करना शुरू कर देती है । </p>



<p>यहीं से एक ही राष्ट्र में रहने वाले नागरिकों के बीच वैमनस्य अपनी जगह बना लेती है जो आपसी सौहार्द और भाईचारा को दो भिन्न भाषा, संस्कृति, साहित्य और कला के बीच रमने वाले लोगों के बीच पनपने नहीं देती । क्षेत्रवाद की अवधारणा सदैव नकारात्मक ही होती है, ऐसा कतई नहीं है । हरेक क्षेत्र की अपनी एक पहचान होती है । </p>



<p>हरेक क्षेत्र की अपनी भिन्न भाषा, संस्कृति, साहित्य, परम्परा, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान, कला, संगीत, आस्था और धार्मिक मान्यता होती है । यह सभी आर्थिक पक्ष, सामाजिक संरचना, धार्मिक मूल्य-मान्यताएँ और सांस्कृतिक सम्पदा ही किसी राज्य की विरासत होती है । </p>



<p>राज्य में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने क्षेत्र की कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान के लिए कर्तव्यनिष्ठ है । किन्तु हमारा उद्देश्य क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास और एकता को स्थापित करना होना चाहिए । यही एक नागरिक की राष्टवाद की भावना है ।</p>



<p>भारत एक संविधान सम्मत राष्ट्र है । भारतीय संविधान भारत के किसी भी भू-भाग में रहने वाले नागरिक की जाति, धर्म, पन्थ, भाषा, कला और संस्कृति का सम्मान करती है । संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य और न्याय व्यवस्था निर्दिष्ट है । </p>



<p>भारतीय संविधान 22 भागों में वर्गीकृत है जिसमें 395 मुख्य अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं । संविधान का अनुच्छेद 343 से 351 राजभाषा हिन्दी से सम्बन्धित है तथा आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय आधिकारिक भाषाओं का उल्लेख है । संविधान में निर्दिष्ट भाषाओं के अतिरिक्त भी भारत में कई भाषाएँ, उपभाषाएँ एवं बोलियाँ बोली जाती हैं । </p>



<p>यह भाषाई विविधता ही भारत की अप्रतिम सुन्दरता है । कोई भी भाषा कदाचित अकेली नहीं होती, अपितु उसके साथ-साथ उस भाषा में विद्यमान संस्कृति और साहित्य भी प्रवाहित होती है । किसी भी भाषा का अस्तित्व उसके बोलने वाले लोगों के आचरण पर टिका होता है । </p>



<p>जब तक समाज में भाषा प्रयुक्त होती रहेगी और उसका अगली पीढ़ी में हस्तांतरण होता रहेगा तब तक भाषा जिन्दा रहेगी । यदि भाषा का हस्तांतरण रुक जाता है या कम हो जाता है, तो उस भाषा के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है । मनुष्य के जीवन में भाषा की बहुत बड़ी भूमिका होती है । </p>



<p>भाषा ने मनुष्य के जीवन को बहुत सरल और व्यवस्थित बनाया है । यदि भाषा ही न होती तो मनुष्य आज प्रगति के इतने उत्कर्ष शिखर तक पहुँच ही नहीं पाता । यह भाषा की ही देन है कि उसने मनुष्य के जीवन को इतना सरल बना दिया है, नहीं तो मनुष्य आज इतनी उचाइयों पर कहाँ होता ? </p>



<p>इतने आविष्कार, खोज-अनुसंधान, सूचना प्रवाह, संचार संसाधन, उद्योग, व्यवसाय, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय आदि का निर्माण कैसे होता ? कैसे रखा जाता वस्तु विनिमय और क्रय-विक्रय का हिसाब ? कैसे रखा जाता इतिहास के दस्तावेजों को सुरक्षित ? विविध संस्कृति और सभ्यता का प्रचार-प्रसार कैसे होता ? </p>



<p>विभिन्न कालखंड के विशाल साहित्य के अस्तित्व का क्या होता ? हमारे विचारों को सक्रिय बनाने में भाषा का बहुत बड़ा योगदान है । भाषा के लिखित और मौखिक रूप के कारण हम अपनी संवेदना, सहानुभूति, आकांक्षा, चिंतन, प्रेम और भाव को दूसरों के हृदय तक संप्रेषित कर पाते हैं । </p>



<p>भाषा का अस्तित्व सिर्फ भाव सम्प्रेषण तक ही सीमित नहीं है, अपितु आज के भूमंडलीकरण, वैज्ञानिक और सूचना क्रांति के समय में राष्ट्रीय अस्मिता से भी है ।</p>



<p>हमारे पास भाषा का बहुत संकुचित दायरा है । असल में हमने भाषा के महत्त्व को समझा ही नहीं है । किसी भी भाषा के विलुप्त होने से उसके स्थान पर उसकी ही कोई परिष्कृत नई भाषा का जन्म नहीं होता ,बल्कि उसे विस्थापित करने वाली वर्चस्ववादी भाषा अपना दबदबा बना लेती है । </p>



<p>विश्व में कई भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं, कई विलुप्त होने की स्थिति में है । भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण के अनुसार विश्व की 6000 भाषाओं में से 4000 भाषाएँ विलुप्त होने की स्थिति में हैं जिनमें 10 प्रतिशत भाषाएँ भारत की हैं । यूनेस्को द्वारा तैयार एक सूची के अनुसार भारत की 42 भाषाएँ एवं बोलियाँ इस समय विलुप्त होने की स्थिति में हैं । </p>



<p>केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार 10000 से भी कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को लुप्तप्राय माना गया है । इस श्रेणी में पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, झारखण्ड, कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, महारष्ट्र आदि राज्यों की क्षेत्रीय भाषाएँ सम्मिलित हैं । </p>



<p>यूनेस्को के अनुसार अंडमान में जारवा भाषा बोलने वालों की संख्या 31 है तो ग्रेट अंडमानीज बोलने वालों की संख्या 5 है । मातृभाषा को संस्कृति का जड़ माना जाता है, किन्तु तेजी से हो रही आर्थिक विकास ने इन क्षेत्रीय भाषओं को तहस-नहस भी किया है । अपनी भाषाओं को बचाने के लिए हमारे पास बहुत थोड़ा सा ही समय बचा है । </p>



<p>यदि समय रहते हमने इनको संरक्षित नहीं किया तो यह बची-खुची भाषाएँ और बोलियाँ भी समाप्त हो जाएँगी । यह सत्य है कि डिजिटल युग में उन्हीं देशों की भाषाएँ बची रहेंगी जो आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक रूप से मजबूत हैं । भारत विश्व में पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जनसंख्या की दृष्टि से भी बहुत विशाल है । </p>



<p>इसे आधार मानकर हम ज्यादा दिन खुश नहीं रह सकते, क्योंकि हमारी वास्तविकता कुछ और है । हमारी युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषाओं से विमुख हो रही है और यह प्रक्रिया बहुत तेजी से अपना काम कर रही है । अधिकांश परिवार में केवल पहली और दूसरी पीढ़ी ही अपनी मातृभाषा में बोलते हैं; तीसरी पीढ़ी तक मातृभाषा का हस्तांतरण नहीं हो रहा है । </p>



<p>यदि कहीं हो भी रहा है तो आगे चलकर उसकी गति रुक जाती है । अंग्रेजी को रोजगार का एक मात्र माध्यम बनाने से तथा ज्ञान-विज्ञान, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को भारतीय भाषाओं में रूपान्तरित न करने से भारतीय भाषाएँ पिछड़ती चली गईं ।</p>



<p> हमारा पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षिक, साहित्यिक और औद्योगिक वातावरण भी इस तरह से तैयार हो चुका है कि जिसे अंग्रेजी आती है उसे ही विद्वान और प्रतिभाशाली समझा जाता है । भारतीय समाज में अंग्रेजी को एक अतिरिक्त कौशल के रूप में लिया जाता है । भूमण्डलीकरण के समय में अंग्रेजी अवश्य एक प्रभावशाली अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और उसके महत्त्व को सीधे-सीधे नकारा भी नहीं जा सकता । </p>



<p>वैश्विक भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है, किन्तु अनिवार्य नहीं है । अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना और अंग्रेजी मानसिकता को ढोना दोनों में बहुत अंतर है । हमें भारतीय भाषाओं के उन्नयन के लिए सबसे पहले अंग्रेजी मानसिकता से बचना होगा ।</p>



<p>भारत भाषाओं की उर्वर भूमि है । यहाँ 123 आधिकारिक भाषाएँ बोली जाती हैं । इसके अतिरिक्त भी यहाँ 1600 से अधिक उपभाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं । प्रत्येक भाषा की अपनी व्यवस्थित वर्णमाला, लिपि, व्याकरण और शब्द भण्डार है । प्रत्येक भाषा की अपनी समृद्ध साहित्य परम्परा है । </p>



<p>यह भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक सम्पदा ही भारत की वास्तविक पहचान है । सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्राथमिक स्तर से मातृभाषा शिक्षा पर जोर दिया गया है । मातृभाषाओं के प्रचार-प्रसार एवं उन्नयन के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस बात की भी पहल करती है कि देश के छात्रों को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के अंतर्गत रोचक गतिविधियों एवं परियोजनाओं के माध्यम से भारतीय भाषाओं का ज्ञान भी दिया जाए । </p>



<p>छात्रों को भारतीय भाषाओं की जानकारी देने, अन्य भारतीय भाषाएँ सीखने के लिए प्रोत्साहित करने और भारतीय भाषाओं के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को मजबूती देने के उद्देश्य से शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने पिछले वर्ष 2022 में भारतीय भाषाओं के महत्त्व पर जोर देने के लिए गठित भारतीय भाषा समिति की सिफारिशों के बाद प्रत्येक वर्ष 11 दिसम्बर को ‘भारतीय भाषा दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी । </p>



<p>विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को चिठ्ठी लिखकर निर्देश दिया था कि उत्तर-दक्षिण के सेतु के नाम से प्रसिद्ध महाकवि सुब्रह्मण्य भारती की जयंती के अवसर पर स्कूलों और कॉलेजों में 11 दिसम्बर को भारतीय भाषा दिवस मनाया जाएगा । </p>



<p>सुब्रमण्यम भारती ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक गीत लिखे थे । चिन्नास्वामी सुब्रमण्यम भारती जी सुप्रसिद्ध लेखक, कवि, पत्रकार, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं तमिलनाडु के समाज सुधारक थे । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा तमिलनाडु और वाराणसी में हुई थी । </p>



<p>राष्ट्रीय एकता और सद्भाव को बढ़ाने में उनके अतुलनीय योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने उनकी जयंती को ‘भारतीय भाषा दिवस’ या ‘भारतीय भाषा उत्सव’ के रूप में राष्ट्रव्यापी रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी । इसके साथ ही केन्द्र सरकार भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए 22 भाषा केन्द्र भी स्थापित करेगी । </p>



<p>इस दिवस का उद्देश्य भाषा सद्भाव का उत्सव मनाना और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है । छात्रों एवं शोधार्थियों को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर उन्हें भारतीय संस्कृति को बृहत रूप में समझने के लिए नए मार्ग का निर्माण करना है । </p>



<p>हम जितनी भाषाएँ सिखेंगे उतना ही हमारा सोचने-समझने का दायरा बढ़ेगा । भाषाएँ हमें जोड़ती हैं, गढ़ती हैं और हमें सहेजती हैं । अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने से हम अपने आप को समृद्ध कर रहे होते हैं । इससे हम अधिक-से-अधिक समुदायों के विचार, कला, रचनात्मकता, इतिहास, साहित्य और संस्कृति को उनकी मौलिकता में समझ रहे होते हैं । </p>



<p>मौलिकता मातृभाषा में ही निहित होती है । अनुवाद एक विकल्प अवश्य है, किन्तु अनुवाद का अपना सिमित दायरा है । मूलभाषा में जो भाव संप्रेषित होती है वो शत प्रतिशत अनुवाद में नहीं उतर सकती । यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य मातृभाषा को जब हम सीख रहे होते हैं, तो हम अपने परिवेश से बाहर के करोड़ों हृदय से जुड़ रहे होते हैं । यह जुड़ाव हमारे आपसी सम्बन्धों को और अधिक मजबूत करता है । </p>



<p>इस अर्थ में देखा जाए तो भारतीय भाषा दिवस राष्ट्रीय एकीकरण का उत्सव है । जब हमारे भीतर सभी भाषाओं को साथ लेकर बढ़ने का संकल्प जन्म लेगा, सभी भाषाओं के प्रति सम्मान बढ़ेगा तो इससे बेहतर भाईचारा कुछ नहीं हो सकता ।</p>



<p>‘भारतीय भाषा उत्सव’ के इस द्वितीय संस्करण में हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के साथ मिलकर संयुक्त रूप में भव्यता के साथ ‘भारतीय भाषा दिवस’ का आयोजन कर रही है । </p>



<p>इस अवसर पर ‘मेधावी छात्र एवं शिक्षक सम्मान समारोह’ योजना के अंतर्गत 10 वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में भारतीय भाषाओं में 90 प्रतिशत या इससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को ‘भाषा दूत सम्मान’, शत प्रतिशत (100%) अंक प्राप्त करने वाले छात्रों को ‘भाषा रत्न सम्मान’ एवं उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों को ‘भाषा गौरव शिक्षक सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा । </p>



<p>मेधावी छात्र एवं शिक्षक सम्मान समारोह हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी की महत्त्वपूर्ण वार्षिक सम्मान योजना है । यह सम्मान योजना दिल्ली प्रदेश के अतिरिक्त गुरुग्राम और गाज़ियाबाद में भी पिछले 7 वर्षों से आयोजित होती आ रही है । </p>



<p>इस वर्ष सम्मान समारोह में दिल्ली प्रदेश के प्रतिष्ठित 212 विद्यालयों के 6194 मेधावी छात्रों के साथ-साथ 9 भारतीय भाषाओं (हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी, बंगाली, तेलुगु, तमिल, गुजराती, सिन्धी और उर्दू) के 605 शिक्षकों को सम्मानित किया जाएगा । </p>



<p>इस सूची में 80 बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने भारतीय भाषाओं में शत प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं । इसी तरह गुरुग्राम, हरियाणा के 56 विद्यालयों के 1816 मेधावी छात्र, जिनमें 75 बच्चों ने शत प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं, उनके साथ 128 शिक्षक भी सम्मिलित होंगे । आइए, इस भारतीय भाषा उत्सव में सहभागी होकर हम सब भारतीय भाषाओं के उन्नयन में अपना अमूल्य योगदान दें ।</p>



<p> इति शुभम् ।</p>
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		<title>हिन्दी में हैं रोजगार की अपार संभावनाएं और उज्ज्वल भविष्य</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Jun 2024 09:47:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कोई भाषा कितनी वैज्ञानिक है अथवा उसके पास कितना शब्द भण्डार है, उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, उस भाषा में निहित ज्ञान । किसी भी भाषा की सम्पन्नता उस भाषा में निहित ज्ञान से ही है, न कि उसके बोलने वालों की संख्या से । यदि भाषा की सम्पन्नता का सूचक लिपि की वैज्ञानिकता, शब्द भण्डार, व्याकरण और बोलने वाले जनसमूहों का जनाधार होता तो हिन्दी का स्थान अग्रपंक्ति में होता । इसका आशय यह नहीं है कि हिन्दी में ज्ञान की कमी है । हिन्दी भाषा में अथाह ज्ञान होते हुए भी उसे समाज से धीरे-धीरे विस्थापित किया जाता रहा है और उसके स्थान पर अंग्रेजी को एक समृद्ध एवं प्रभावशाली भाषा के रूप में स्थापित किया गया है । भारतीय परिप्रेक्ष्य में अंग्रेजी भाषा को एक अतिरिक्त कौशल के रूप में देखा जाता है । भारतीय समाज में अंग्रेजी को मेधा और प्रतिभा से जोड़ दिया गया है । जिसे अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हो उसे बौद्धिक माना जाने लगा । अंग्रेजी बोलने वाले को प्रकाण्ड विद्वान के रूप में देखा जाने लगा । समाज के हर वर्ग तक इस धारणा को स्थापित किया गया कि अंग्रेजी ही प्रतिष्ठा और सम्पन्नता की निशानी है । सामान्य रूप से सतही तौर पर यह धारणा सही लगती हो, किन्तु इसकी गहराई में जाएँ तो यह अनर्थक प्रतीत होती है । एक सामान्य नागरिक के पास भी भाषा कौशल होना आवश्यक है । यदि आप एक से अधिक भाषाएँ जानते हों तो यह आपके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है । भाषा चाहे कोई भी हो, उसमें इतना सामर्थ्य नहीं होता कि वो किसी व्यक्ति को प्रतिभा सम्पन्न बना सके, बल्कि भाषा में निहित ज्ञान ही व्यक्ति के विचारों को प्रभावित करता है । इसी तरह किसी भी भाषा को बोल लेने मात्र से कोई विद्वान नहीं बनता । यदि ऐसा होता तो अमेरिका के गलियों में झाड़ू लगाने वाले भी सभी विद्वान की श्रेणी में आते । वहाँ तो कारखानों में काम करने वाले श्रमिक एवं मजदूर भी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, क्या इससे वे सभ्य व ज्ञानी मान लिए जाते हैं ? क्या फ्रांस में फ्रेंच बोलने वाले सभी नागरिक प्रतिभाशाली हैं ? क्या जर्मन में सभी बौद्धिक व्यक्ति होते हैं ? मूल अर्थ यह है कि बोलना आना ही किसी भी भाषा की विद्वता नहीं है । भाषा शिक्षण के अनिवार्य तत्व हैं – लिखना, पढ़ना, बोलना और समझना । जब तक इन चारों तत्वों का समिश्रण नहीं हो जाता तब तक किसी भी व्यक्ति का भाषा शिक्षण अपूर्ण ही रहता है । सामान्यतया किसी भी भाषा को छह महीने में सीखा जा सकता है । जापान, कोरिया जैसे विकसित देशों में वीजा लेने के लिए छह महीने का कोर्स करना अनिवार्य होता है । विचारणीय यह है कि जब किसी भी भाषा को छह महीने में सीखा जा सकता है, तो हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसी व्यवस्था क्यों है कि बच्चों को नर्सरी से ही अंग्रेजी का तनाव सहना पड़ता है ? अंग्रेजी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और आज के समय में इसकी महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु अंग्रेजी के बलबूते ही विकास के कार्य हो सकते हैं अथवा देश निर्माण के सभी पूर्वाधार अंग्रेजी में ही सिद्ध होते हैं, ऐसा कतई नहीं है । विश्व के जितने भी विकसित अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे अपनी भाषा में ही सभी कार्य करतीं हैं । चीन, जापान, रूस, इजराइल, फ्रांस, कोरिया आदि इसके उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी भाषा के दम पर आज विश्व कीर्तिमान स्थापित किए हुए हैं । विश्व के अनेकों शोधों में यह पाया गया है कि बच्चों को उसकी मातृभाषा में शिक्षा देना शिक्षा का सबसे सुलभ और सरल माध्यम है । बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए बच्चों को उसकी मातृभाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए । हम विश्व की किसी भी भाषा में बोल सकते हैं, पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं किन्तु उस भाषा में कतई सोच नहीं सकते । हम अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को अपनी मातृभाषा में ही स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाते हैं । मनुष्य का चिंतन और रचनात्मकता उसकी मातृभाषा में ही सम्पन्न होती है । अक्सर यह भ्रम भी फैलाया जाता है कि हिन्दी में रोजगार नहीं है अथवा हिन्दी में पढ़ने से भविष्य सुरक्षित नहीं है । हिन्दी में रोजगार की असीम संभावनाएं है । 2022 बैच के सिविल सेवा परीक्षा (यूपीएससी) में हिन्दी माध्यम से 54 छात्रों का चयन होना यह बताता है कि हिन्दी में उज्ज्वल भविष्य है । यूपीएससी के इतिहास में यह हिन्दी का सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन है । विशेष बात यह है कि 54 छात्रों में से 29 छात्रों ने वैकल्पिक विषय के रूप में हिन्दी साहित्य को चुना था । 2021 के बैच में हिन्दी माध्यम से 24 छात्रों का चयन हुआ था । इससे यह ज्ञात होता है कि हिन्दी का ग्राफ बढ़ रहा है । आने वाले समय में स्थिति में और सुधार होगा और समाज में हिन्दी को लेकर जागृति बढ़ेगी । हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी की ओर से सिविल सेवा में सफल होने वाले समस्त छात्रों को हार्दिक बधाई और उन सभी बच्चों को शुभकामनाएँ जो भारतीय भाषाओं को केंद्र में रख कर अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं । हम उन सभी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं ।]]></description>
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<p>कोई भाषा कितनी वैज्ञानिक है अथवा उसके पास कितना शब्द भण्डार है, उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, उस भाषा में निहित ज्ञान । किसी भी भाषा की सम्पन्नता उस भाषा में निहित ज्ञान से ही है, न कि उसके बोलने वालों की संख्या से । यदि भाषा की सम्पन्नता का सूचक लिपि की वैज्ञानिकता, शब्द भण्डार, व्याकरण और बोलने वाले जनसमूहों का जनाधार होता तो हिन्दी का स्थान अग्रपंक्ति में होता । </p>



<p>इसका आशय यह नहीं है कि हिन्दी में ज्ञान की कमी है । हिन्दी भाषा में अथाह ज्ञान होते हुए भी उसे समाज से धीरे-धीरे विस्थापित किया जाता रहा है और उसके स्थान पर अंग्रेजी को एक समृद्ध एवं प्रभावशाली भाषा के रूप में स्थापित किया गया है । भारतीय परिप्रेक्ष्य में अंग्रेजी भाषा को एक अतिरिक्त कौशल के रूप में देखा जाता है । </p>



<p>भारतीय समाज में अंग्रेजी को मेधा और प्रतिभा से जोड़ दिया गया है । जिसे अंग्रेजी भाषा का ज्ञान हो उसे बौद्धिक माना जाने लगा । अंग्रेजी बोलने वाले को प्रकाण्ड विद्वान के रूप में देखा जाने लगा । समाज के हर वर्ग तक इस धारणा को स्थापित किया गया कि अंग्रेजी ही प्रतिष्ठा और सम्पन्नता की निशानी है । </p>



<p>सामान्य रूप से सतही तौर पर यह धारणा सही लगती हो, किन्तु इसकी गहराई में जाएँ तो यह अनर्थक प्रतीत होती है । एक सामान्य नागरिक के पास भी भाषा कौशल होना आवश्यक है । यदि आप एक से अधिक भाषाएँ जानते हों तो यह आपके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है । </p>



<p>भाषा चाहे कोई भी हो, उसमें इतना सामर्थ्य नहीं होता कि वो किसी व्यक्ति को प्रतिभा सम्पन्न बना सके, बल्कि भाषा में निहित ज्ञान ही व्यक्ति के विचारों को प्रभावित करता है । इसी तरह किसी भी भाषा को बोल लेने मात्र से कोई विद्वान नहीं बनता । यदि ऐसा होता तो अमेरिका के गलियों में झाड़ू लगाने वाले भी सभी विद्वान की श्रेणी में आते । </p>



<p>वहाँ तो कारखानों में काम करने वाले श्रमिक एवं मजदूर भी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, क्या इससे वे सभ्य व ज्ञानी मान लिए जाते हैं ? क्या फ्रांस में फ्रेंच बोलने वाले सभी नागरिक प्रतिभाशाली हैं ? क्या जर्मन में सभी बौद्धिक व्यक्ति होते हैं ? मूल अर्थ यह है कि बोलना आना ही किसी भी भाषा की विद्वता नहीं है । </p>



<p>भाषा शिक्षण के अनिवार्य तत्व हैं – लिखना, पढ़ना, बोलना और समझना । जब तक इन चारों तत्वों का समिश्रण नहीं हो जाता तब तक किसी भी व्यक्ति का भाषा शिक्षण अपूर्ण ही रहता है ।</p>



<p>सामान्यतया किसी भी भाषा को छह महीने में सीखा जा सकता है । जापान, कोरिया जैसे विकसित देशों में वीजा लेने के लिए छह महीने का कोर्स करना अनिवार्य होता है । विचारणीय यह है कि जब किसी भी भाषा को छह महीने में सीखा जा सकता है, तो हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसी व्यवस्था क्यों है कि बच्चों को नर्सरी से ही अंग्रेजी का तनाव सहना पड़ता है ? </p>



<p>अंग्रेजी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और आज के समय में इसकी महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु अंग्रेजी के बलबूते ही विकास के कार्य हो सकते हैं अथवा देश निर्माण के सभी पूर्वाधार अंग्रेजी में ही सिद्ध होते हैं, ऐसा कतई नहीं है । विश्व के जितने भी विकसित अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे अपनी भाषा में ही सभी कार्य करतीं हैं । </p>



<p>चीन, जापान, रूस, इजराइल, फ्रांस, कोरिया आदि इसके उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी भाषा के दम पर आज विश्व कीर्तिमान स्थापित किए हुए हैं । विश्व के अनेकों शोधों में यह पाया गया है कि बच्चों को उसकी मातृभाषा में शिक्षा देना शिक्षा का सबसे सुलभ और सरल माध्यम है । </p>



<p>बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए बच्चों को उसकी मातृभाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए । हम विश्व की किसी भी भाषा में बोल सकते हैं, पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं किन्तु उस भाषा में कतई सोच नहीं सकते । </p>



<p>हम अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को अपनी मातृभाषा में ही स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाते हैं । मनुष्य का चिंतन और रचनात्मकता उसकी मातृभाषा में ही सम्पन्न होती है ।</p>



<p>अक्सर यह भ्रम भी फैलाया जाता है कि हिन्दी में रोजगार नहीं है अथवा हिन्दी में पढ़ने से भविष्य सुरक्षित नहीं है । हिन्दी में रोजगार की असीम संभावनाएं है । 2022 बैच के सिविल सेवा परीक्षा (यूपीएससी) में हिन्दी माध्यम से 54 छात्रों का चयन होना यह बताता है कि हिन्दी में उज्ज्वल भविष्य है । </p>



<p>यूपीएससी के इतिहास में यह हिन्दी का सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन है । विशेष बात यह है कि 54 छात्रों में से 29 छात्रों ने वैकल्पिक विषय के रूप में हिन्दी साहित्य को चुना था । 2021 के बैच में हिन्दी माध्यम से 24 छात्रों का चयन हुआ था । इससे यह ज्ञात होता है कि हिन्दी का ग्राफ बढ़ रहा है । </p>



<p>आने वाले समय में स्थिति में और सुधार होगा और समाज में हिन्दी को लेकर जागृति बढ़ेगी । हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी की ओर से सिविल सेवा में सफल होने वाले समस्त छात्रों को हार्दिक बधाई और उन सभी बच्चों को शुभकामनाएँ जो भारतीय भाषाओं को केंद्र में रख कर अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं । हम उन सभी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं ।</p>
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		<title>विश्व हिन्दी सम्मेलन और हिन्दी का वैश्वीकरण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Jun 2024 09:45:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 15 से 17 फरवरी, 2023 तक फिजी में ‘12वां विश्व हिन्दी सम्मेलन’ का आयोजन किया जा रहा है । फिजी के नांडी शहर में होने वाले इस तीन दिवसीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और फिजी सरकार द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है । 2018 में मॉरीशस में हुए 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में ही यह घोषणा की गई थी कि 12वां विश्व हिन्दी सम्मेलन फिजी में आयोजित किया जाएगा । यह आयोजन 2021 में किया जाना था, किन्तु कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण इसे स्थगित करना पड़ा । विश्व हिन्दी सम्मेलन को 3 वर्ष के अन्तराल में आयोजित किए जाने का प्रावधान है । शुरू में इसे 4 वर्ष के अन्तराल में आयोजित किया जाता था । वर्तमान समय में फिजी में तीन भाषाओं को सरकारी स्तर पर मान्यता प्राप्त है जिनमें से एक हिन्दी भी है । संयुक्त राष्ट्र के 2020 के एक रिपोर्ट के अनुसार फिजी की कुल जनसंख्या में 30 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं । 1975 में नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से लेकर अब तक के 11 वें संस्करण तक विश्व हिन्दी सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की एक आधिकारिक भाषा बनाना रहा है । भले ही इस उद्देश्य की प्राप्ति अब तक नहीं हो पाई है, किन्तु हिन्दी के वैश्वीकरण में विश्व हिन्दी सम्मेलन की भूमिका अतुलनीय है । प्रत्येक सम्मेलन में विश्व के कई देशों से हिन्दी प्रेमी, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, शिक्षविद् एवं भाषाविद् बड़ी संख्या में इस आयोजन में सम्मिलित होते हैं । विगत में हुए सम्मेलनों की श्रृंखलाओं को देखें तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रति लोगों की जागरूकता अवश्य बड़ी है । हिन्दी की विकास यात्रा का आकलन किया जाए तो हिन्दी ने कई मुश्किल समझी जाने वाली चुनौतियों को भी पार कर लिया है । तकनीकी रूप से भी हिन्दी अब एक सशक्त भाषा बन चुकी है । आज कंप्यूटर के अनुप्रयोग तथा सूचना एवं संचार क्रांति के कारण हिंदी का महत्त्व और भी अधिक हो गया है । प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन की संकल्पना के द्वारा ही 2008 में मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की गई । कई देशों में इसके क्षेत्रीय कार्यलय खोले जाने की योजना भी प्रस्तावित है । हिन्दी के बढ़ते हुए वैश्वीकरण में महात्मा गाँधी की भाषा नीति का महत्त्वपूर्ण स्थान है । हिन्दी के प्रचार-प्रसार और आधुनिक शिक्षण उपकरण विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय भी विश्व हिन्दी सम्मेलन की संकल्पना का ही परिणाम है । विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्देश्यों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी के विकास और उन्नयन के लिए कई ठोस कार्यक्रम चलाए गए हैं, जिसके अंतर्गत विदेशों में हिन्दी के शिक्षण, पाठ्यक्रमों के निर्धारण, पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण, अध्यापकों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था की गई है । हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विषयों पर सरल एवं उपयोगी पुस्तकों का सृजन किया गया है । हिन्दी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए विदेशी हिन्दी लेखकों को भी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करके उन्हें प्रोत्साहन दिए जाने की व्यवस्था की गई है । साहित्य से इतर हिन्दी को सूचना तकनीक के विकास, मानकीकरण, विज्ञान एवं तकनीकी लेखन, वाणिज्य एवं संचार माध्यमों की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित किया जाने लगा है । विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार और पाठ्यक्रमों के निर्माण में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान भी अभूतपूर्ण कार्य कर रहा है । इस तरह हिन्दी का वैश्वीकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है और इसे एक महत्त्वपूर्ण संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है ।आज विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी को एक विशेष भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है । सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में भी हिन्दी स्थापित हो चुकी है । वैश्विक स्तर के साहित्य और सिनेमा के निर्माण ने भी हिन्दी के वैश्विकरण को बढ़ावा दिया है । हिंदी में वैश्विक स्तर के साहित्य सृजन ने हिंदी को वैश्विक चेतना की संवाहक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है । विश्व के लगभग 73 देशों में हिंदी अपना स्थान बना चुकी है । विश्व में हिन्दी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा है । यही कारण है कि आज विश्व भारत को एक उभरता हुआ महाशक्ति के रूप में देखने लगा है । हिंदी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ते प्रभुत्व क्षेत्र को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने कामकाज के भाषा के रूप में हिन्दी को भी सम्मिलित कर लिया है । भले ही, हिन्दी अभी भी संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं कर पाई हो, किन्तु इससे यह संभावना और प्रगाढ़ हो चुकी है कि आने वाले समय में हिन्दी और अधिक मुखर होगी ।हिन्दुस्तानी भाषा भारती पत्रिका की ओर से आप सभी को 12 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की अग्रिम शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ । सुधाकर&#160;पाठक]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 15 से 17 फरवरी, 2023 तक फिजी में ‘12वां विश्व हिन्दी सम्मेलन’ का आयोजन किया जा रहा है । फिजी के नांडी शहर में होने वाले इस तीन दिवसीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और फिजी सरकार द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है । </p>



<p>2018 में मॉरीशस में हुए 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में ही यह घोषणा की गई थी कि 12वां विश्व हिन्दी सम्मेलन फिजी में आयोजित किया जाएगा । यह आयोजन 2021 में किया जाना था, किन्तु कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण इसे स्थगित करना पड़ा । विश्व हिन्दी सम्मेलन को 3 वर्ष के अन्तराल में आयोजित किए जाने का प्रावधान है । </p>



<p>शुरू में इसे 4 वर्ष के अन्तराल में आयोजित किया जाता था । वर्तमान समय में फिजी में तीन भाषाओं को सरकारी स्तर पर मान्यता प्राप्त है जिनमें से एक हिन्दी भी है । संयुक्त राष्ट्र के 2020 के एक रिपोर्ट के अनुसार फिजी की कुल जनसंख्या में 30 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं ।</p>



<p>1975 में नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन से लेकर अब तक के 11 वें संस्करण तक विश्व हिन्दी सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की एक आधिकारिक भाषा बनाना रहा है । भले ही इस उद्देश्य की प्राप्ति अब तक नहीं हो पाई है, किन्तु हिन्दी के वैश्वीकरण में विश्व हिन्दी सम्मेलन की भूमिका अतुलनीय है । </p>



<p>प्रत्येक सम्मेलन में विश्व के कई देशों से हिन्दी प्रेमी, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, शिक्षविद् एवं भाषाविद् बड़ी संख्या में इस आयोजन में सम्मिलित होते हैं । विगत में हुए सम्मेलनों की श्रृंखलाओं को देखें तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रति लोगों की जागरूकता अवश्य बड़ी है । </p>



<p>हिन्दी की विकास यात्रा का आकलन किया जाए तो हिन्दी ने कई मुश्किल समझी जाने वाली चुनौतियों को भी पार कर लिया है । तकनीकी रूप से भी हिन्दी अब एक सशक्त भाषा बन चुकी है । आज कंप्यूटर के अनुप्रयोग तथा सूचना एवं संचार क्रांति के कारण हिंदी का महत्त्व और भी अधिक हो गया है । </p>



<p>प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन की संकल्पना के द्वारा ही 2008 में मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की गई । कई देशों में इसके क्षेत्रीय कार्यलय खोले जाने की योजना भी प्रस्तावित है । हिन्दी के बढ़ते हुए वैश्वीकरण में महात्मा गाँधी की भाषा नीति का महत्त्वपूर्ण स्थान है । </p>



<p>हिन्दी के प्रचार-प्रसार और आधुनिक शिक्षण उपकरण विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय भी विश्व हिन्दी सम्मेलन की संकल्पना का ही परिणाम है ।</p>



<p>विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्देश्यों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिन्दी के विकास और उन्नयन के लिए कई ठोस कार्यक्रम चलाए गए हैं, जिसके अंतर्गत विदेशों में हिन्दी के शिक्षण, पाठ्यक्रमों के निर्धारण, पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण, अध्यापकों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था की गई है । </p>



<p>हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विषयों पर सरल एवं उपयोगी पुस्तकों का सृजन किया गया है । हिन्दी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए विदेशी हिन्दी लेखकों को भी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करके उन्हें प्रोत्साहन दिए जाने की व्यवस्था की गई है । </p>



<p>साहित्य से इतर हिन्दी को सूचना तकनीक के विकास, मानकीकरण, विज्ञान एवं तकनीकी लेखन, वाणिज्य एवं संचार माध्यमों की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित किया जाने लगा है । विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार और पाठ्यक्रमों के निर्माण में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान भी अभूतपूर्ण कार्य कर रहा है । </p>



<p>इस तरह हिन्दी का वैश्वीकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है और इसे एक महत्त्वपूर्ण संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है ।आज विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी को एक विशेष भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है । सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में भी हिन्दी स्थापित हो चुकी है । </p>



<p>वैश्विक स्तर के साहित्य और सिनेमा के निर्माण ने भी हिन्दी के वैश्विकरण को बढ़ावा दिया है । हिंदी में वैश्विक स्तर के साहित्य सृजन ने हिंदी को वैश्विक चेतना की संवाहक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है । विश्व के लगभग 73 देशों में हिंदी अपना स्थान बना चुकी है । </p>



<p>विश्व में हिन्दी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा है । यही कारण है कि आज विश्व भारत को एक उभरता हुआ महाशक्ति के रूप में देखने लगा है । हिंदी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ते प्रभुत्व क्षेत्र को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने कामकाज के भाषा के रूप में हिन्दी को भी सम्मिलित कर लिया है । </p>



<p>भले ही, हिन्दी अभी भी संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं कर पाई हो, किन्तु इससे यह संभावना और प्रगाढ़ हो चुकी है कि आने वाले समय में हिन्दी और अधिक मुखर होगी ।<br>हिन्दुस्तानी भाषा भारती पत्रिका की ओर से आप सभी को 12 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन’ की अग्रिम शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ ।</p>



<p>सुधाकर&nbsp;पाठक</p>
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		<title>संयुक्त राष्ट्र महासभा की भाषाओं में अब होगी हिन्दी की गूंज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Jun 2024 09:42:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैश्विक स्तर पर हिन्दी के बढ़ते प्रभुत्व क्षेत्र को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से बहुभाषावाद पर भारत के प्रस्ताव को पारित कर दिया गया है । अब संयुक्त राष्ट्र ने अपनी भाषाओं में हिंदी को भी सम्मिलित कर लिया है । इस बहुभाषावाद प्रस्ताव के तहत उर्दू और बांग्ला भाषा को भी सम्मिलित किया गया है । भारत द्वारा 1946 में प्रस्तावित पत्र में कहा गया था कि सयुक्त राष्ट्र के उद्दश्यों को तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता जब तक कि विश्व के लोगों तक इसकी जानकारी नहीं हो जाती । विश्व के जनसमुदाय तक पहुँचने के लिए बहुभाषावाद एक सर्वोत्तम माध्यम है । जब अनेक भाषाओं के माध्यम से सूचनाओं, उद्देश्यों एवं योजनाओं को संप्रेषित किया जाएगा, तब वास्तव में ही उसकी पहुँच और धमक बृहत् और व्यापक होगी । इसी बात को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार महसूस किया कि संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में हिन्दी एवं अन्य भाषाओं को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए । यहाँ ध्यान दिया जाए कि संयुक्त राष्ट्र के कामकाज के लिए ही हिन्दी को प्रयुक्त किया जा रहा है, किन्तु यह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं है । फिर भी, भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । भारत और विश्व के सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए यह बड़े गर्व की बात है।द्वितीय विश्वयुद्द समाप्त होने के बाद विजेता देशों ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से ‘संयुक्त राष्ट्र’ नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था को स्थापित किया था । वे चाहते थे कि भविष्य में फिर कभी विश्वयुद्ध जैसी स्थिति जन्म न लें और इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, मानव अधिकार एवं वैश्विक शान्ति कायम रहे । उस समय संयुक्त राष्ट्र के अधिकारपत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर से 24 अक्टूबर, 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई । शुरू में अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और चीनी भाषा को ही आधिकारिक भाषा के रूप में सम्मिलीत किया गया था, क्योंकि यह महाशक्ति देशों की भाषा थीं । बाद में अरबी और स्पेनिश को भी अधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया । वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र महासभा में 193 देश सम्मिलित हैं और अभी तक 6 भाषाओं को अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है । इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सचिवालय की कामकाजी भाषाओं में केवल अंग्रेजी और फ्रेंच ही प्रयुक्त की जाती रही हैं, किन्तु अब हिन्दी को भी सम्मिलित करने से संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर हिंदी में भी सूचनाओं को संग्रहित किया जाएगा ।संयुक्त राष्ट्र में किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए कोई विशेष मापदण्ड नहीं बनाया गया है, किन्तु इसकी भी एक प्रक्रिया है जिसके तहत किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है । किसी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा में साधारण बहुमत द्वारा संकल्प को स्वीकार करना और संयुक्त राष्ट्र की कुल सदस्यता के दो तिहाई बहुमत द्वारा उसे अन्तिम रूप से पारित करना होता है । भारत लम्बे समय से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने की मुहीम में प्रयासरत है । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप प्रतिष्ठित करने के उदेश्य से 2008 में मॉरिसस में विश्व हिन्दी सचिवालय खोला गया । वर्ल्ड लैंग्वेज डेटाबेस के 22वें संस्करण एथ्नोलॉज के अनुसार विश्व की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएँ हैं, जिनमें हिन्दी तीसरे पायदान पर है । एथ्नोलॉज में बताया गया है कि विश्व में 61.5 करोड़ लोग हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं । अपनी मजबूत संख्याबल के आधार पर ही भारत हिन्दी को एक वैश्विक भाषा बनाने के लिए आन्दोलनरत है । बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में भारत एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उससे विश्व का ध्यान भारत की शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, सामाजिक संरचना और लोक कलाओं को जानने के लिए उत्सुक है । संयुक्त राष्ट्र महासभा के कामकाजी भाषा के रूप में ही सही, हिन्दी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है । इससे देश के भीतर हिन्दी के प्रति लोगों के मन में जो संकुचित धारणा और हीन भावना पनपी है उसमें सकारात्मक परिवर्तन आएगा । हिन्दी के लिए जहाँ भी बंदिशें थीं उनकी नकेल टूटेंगी और विकास के नए द्वार खुलेंगे । अब समय आ गया है कि हम विदेशी भाषाओं को शिक्षा के माध्यम की भाषा बनाने के बजाय उन भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, सूचना, तकनीकी जैसे विषयों को हिन्दी में अनुवाद करें और देश-विदेश में प्रचार-प्रसार करें । आज हम गर्व करते हैं कि हिन्दी विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा है । संख्याबल के आधार पर हिन्दी मजबूत है, यह अच्छी बात है । साहित्य और सिनेमा की भाषा के बदौलत आज हम विश्व में अपनी पहुँच बना पाए हैं, किन्तु वो दिन कितना सुखद होगा जब हिन्दी विश्व के तमाम लोगों के घरों में चूल्हा जलाने का काम करें; उनकी पेट की भाषा बने ।]]></description>
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<p>वैश्विक स्तर पर हिन्दी के बढ़ते प्रभुत्व क्षेत्र को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से बहुभाषावाद पर भारत के प्रस्ताव को पारित कर दिया गया है । अब संयुक्त राष्ट्र ने अपनी भाषाओं में हिंदी को भी सम्मिलित कर लिया है । इस बहुभाषावाद प्रस्ताव के तहत उर्दू और बांग्ला भाषा को भी सम्मिलित किया गया है । </p>



<p>भारत द्वारा 1946 में प्रस्तावित पत्र में कहा गया था कि सयुक्त राष्ट्र के उद्दश्यों को तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता जब तक कि विश्व के लोगों तक इसकी जानकारी नहीं हो जाती । विश्व के जनसमुदाय तक पहुँचने के लिए बहुभाषावाद एक सर्वोत्तम माध्यम है । जब अनेक भाषाओं के माध्यम से सूचनाओं, उद्देश्यों एवं योजनाओं को संप्रेषित किया जाएगा, तब वास्तव में ही उसकी पहुँच और धमक बृहत् और व्यापक होगी । </p>



<p>इसी बात को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार महसूस किया कि संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में हिन्दी एवं अन्य भाषाओं को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए । यहाँ ध्यान दिया जाए कि संयुक्त राष्ट्र के कामकाज के लिए ही हिन्दी को प्रयुक्त किया जा रहा है, किन्तु यह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं है । </p>



<p>फिर भी, भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । भारत और विश्व के सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए यह बड़े गर्व की बात है।द्वितीय विश्वयुद्द समाप्त होने के बाद विजेता देशों ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से ‘संयुक्त राष्ट्र’ नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था को स्थापित किया था । </p>



<p>वे चाहते थे कि भविष्य में फिर कभी विश्वयुद्ध जैसी स्थिति जन्म न लें और इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, मानव अधिकार एवं वैश्विक शान्ति कायम रहे । उस समय संयुक्त राष्ट्र के अधिकारपत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर से 24 अक्टूबर, 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई । </p>



<p>शुरू में अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और चीनी भाषा को ही आधिकारिक भाषा के रूप में सम्मिलीत किया गया था, क्योंकि यह महाशक्ति देशों की भाषा थीं । बाद में अरबी और स्पेनिश को भी अधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया । वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र महासभा में 193 देश सम्मिलित हैं और अभी तक 6 भाषाओं को अधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है । </p>



<p>इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सचिवालय की कामकाजी भाषाओं में केवल अंग्रेजी और फ्रेंच ही प्रयुक्त की जाती रही हैं, किन्तु अब हिन्दी को भी सम्मिलित करने से संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर हिंदी में भी सूचनाओं को संग्रहित किया जाएगा ।<br>संयुक्त राष्ट्र में किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए कोई विशेष मापदण्ड नहीं बनाया गया है, किन्तु इसकी भी एक प्रक्रिया है जिसके तहत किसी भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है । </p>



<p>किसी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा में साधारण बहुमत द्वारा संकल्प को स्वीकार करना और संयुक्त राष्ट्र की कुल सदस्यता के दो तिहाई बहुमत द्वारा उसे अन्तिम रूप से पारित करना होता है । भारत लम्बे समय से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने की मुहीम में प्रयासरत है ।</p>



<p>हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप प्रतिष्ठित करने के उदेश्य से 2008 में मॉरिसस में विश्व हिन्दी सचिवालय खोला गया । वर्ल्ड लैंग्वेज डेटाबेस के 22वें संस्करण एथ्नोलॉज के अनुसार विश्व की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएँ हैं, जिनमें हिन्दी तीसरे पायदान पर है । </p>



<p>एथ्नोलॉज में बताया गया है कि विश्व में 61.5 करोड़ लोग हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं । अपनी मजबूत संख्याबल के आधार पर ही भारत हिन्दी को एक वैश्विक भाषा बनाने के लिए आन्दोलनरत है ।</p>



<p>बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में भारत एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उससे विश्व का ध्यान भारत की शिक्षा, साहित्य, संस्कृति, सामाजिक संरचना और लोक कलाओं को जानने के लिए उत्सुक है । </p>



<p>संयुक्त राष्ट्र महासभा के कामकाजी भाषा के रूप में ही सही, हिन्दी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है । इससे देश के भीतर हिन्दी के प्रति लोगों के मन में जो संकुचित धारणा और हीन भावना पनपी है उसमें सकारात्मक परिवर्तन आएगा । हिन्दी के लिए जहाँ भी बंदिशें थीं उनकी नकेल टूटेंगी और विकास के नए द्वार खुलेंगे । </p>



<p>अब समय आ गया है कि हम विदेशी भाषाओं को शिक्षा के माध्यम की भाषा बनाने के बजाय उन भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, सूचना, तकनीकी जैसे विषयों को हिन्दी में अनुवाद करें और देश-विदेश में प्रचार-प्रसार करें । आज हम गर्व करते हैं कि हिन्दी विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली दूसरी भाषा है । </p>



<p>संख्याबल के आधार पर हिन्दी मजबूत है, यह अच्छी बात है । साहित्य और सिनेमा की भाषा के बदौलत आज हम विश्व में अपनी पहुँच बना पाए हैं, किन्तु वो दिन कितना सुखद होगा जब हिन्दी विश्व के तमाम लोगों के घरों में चूल्हा जलाने का काम करें; उनकी पेट की भाषा बने ।</p>
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